श्रीमद भगवद पुराण प्रथम अध्याय-सातवां स्कन्ध प्रारम्भ
दो०-कुल पन्द्रह अध्याय हैं, या सप्तम स्कंध ।
वर्णन श्री शुकदेवजी उत्तम सकल निबन्ध ।।
हिरण्यकश्यप के वंश की, हाल कहूँ समय ।
या पहले अध्याय में, दीयो बन्श बताय।॥
परीक्षित ने पूछा-हे शुकदेव जी ! जो ईश्वर सब प्राणियों में समान दृष्टि रखते हैं, फिर उनने विषम बुद्धि वाले मनुष्य की तरह इन्द्र के भले के लिये राक्षसों एवं दैत्यों को क्यों कर मारा सो मुझ से कहिये। श्री शुकदेव जो बोले-हे परीक्षित ! भगवान अजन्मा सब प्रपंच महाभूतों से रहित है। परंतु समय के अनुसार (रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण, यह घटते बढ़ते रहते हैं । सत्वगुण के समय में देवता और ऋषियों की वृद्धि होती है । रजोगुण के समय में असुरों की वृद्धि होती है। तमोगुण के समय में यक्ष राक्षसों की वृद्धि होती है। अतः जैसी परिस्थिति होती है उसी के अनुरूप भगवान हो जाता है। यही प्रश्न एक बार पहिले राजा युधिष्ठिर ने नारद जी से किया था। सो उन्होंने एक इतिहास सुनाया था वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ। अपने राजसूय यज्ञ में शिशु पाल की मूर्ति देख कर आश्चर्य से पूछा था। नारद ने सुनाथा था कि-हे युधिष्ठिर ! शिशुपाल और दंतवक्र दोनों ही विष्णु भगवान के श्रेष्ठ पार्षदों में से थे, जो कि सनकादिक ब्राह्मणों के श्राप के कारण अपने स्थान से भ्रष्ट हुये थे। तब युधिष्ठिर ने पूछा था कि यह किस कारण श्राप को प्राप्त हुए थे। नारद जी ने कहा-हे राजन् ! एक बार सनकादिक ब्राह्मण विष्णु भगवान के दर्शन को आये थे तब जय-विजय नाम के दो पार्षदों ने उन्हें नंगादेख कर अन्दर विष्णु कक्ष में जाने से रोक दिया था। जिस कारण उनके दोनों द्वारपालों को श्राप दिया था कि तुम दोनों मृत्युलोक में जाय आसुरी योनि भोगो । तीन जन्म भोगने पर फिर अपने पद को प्राप्त होओगे । सो वही दोनों पहिले जन्म में कश्यप की स्त्री दिति के हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष हुये जो भगवान विष्णु द्वारा वराह अवतार और नृसिंह अवतार धर कर उस योनि से मुक्ति को पाए। दूसरे जन्म में विश्रवा ऋषि के अंस से केशनी नाम स्त्री के गर्भ से रावण और कुम्भकर्ण हुये जो विष्णु ने राम अवतार धारण कर उस योनि से मुक्ति दिलाई। पश्चात वही दोनों शिशुपाल और दन्तवक्र है जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मोक्ष को प्राप्त हुये। तब युधिष्ठिर ने नारद मुनि से प्रश्न किया कि प्रहलाद को अपने पिता हिरण्यकश्यप से वैर-भाव क्यों हुआ सो सब कहिये।
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