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सनकादिक मुनियों द्वारा भगवद कथा का महात्मय


श्रीमद भागवद पुराण दूसरा अध्याय [मंगला चरण] (सनत्कुमार नारद संवाद)

दोहा-

गीता जान विराग सुन नारद चेत न आय।।

ता मुनि ने कहि भागवत चेत हेत समाय ।।१।।



श्रीमद्भागवद पुराण महात्मय का द्वितीय आध्यय [मंगला चरण]

वेद - वेदांत से भी ज्ञान भक्ति को चेत ना आया, तब सनत्कुमार जी द्वारा बतलाया ग्या श्रीमद भगवद जी का भेद।।

नारदजी बोले-हे बाले। तुम वृथा खेद करती हो, श्री कृष्ण भगवान के चरण कमल का स्मरण करो, तुम्हारा दुःख जाता रहेगा। जिन श्रीकृष्णचन्द्रजी ने कौरवों के महा संकट से द्रोपदी की रक्षा की और शंखचूड़ आदि दुष्टों से गोपियों को बचाया, वह श्रीकृष्ण कहीं चले नहीं गये। हे भक्ति । तुम तो भगवान को प्राणों से भी अधिक प्यारी हो, तुम्हारे बुलाये हुये भगवान तो नीचजनों के घरों में भी जाते हैं । सतयुग आदि तीनों युगों में तो ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के साधन थे। इन्हीं



(२)
दोनों से महात्माओं का उद्धार होता था, परन्तु कलियुग में केवल भक्ति हो ब्रह्मासायुज्य को देने वाली है। एक समय अवसर पाय तुमने हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना की थी कि मुझको क्या आज्ञा है? तब कृष्ण भगवान ने तुमको आज्ञा दी थी कि हमारे भक्तों को पुष्ट करो। तुमने उस आज्ञा को अङ्गीकार किया तब भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र तुम पर प्रसन्न हुए और तुमको मुक्ति नाम दासी और ज्ञान, वैराग्य नाम दो दास दिये। तुम्हारा मुख्य निवास स्थान बैकुण्ठ है सो वहाँ तो तुम अपने साक्षात रूप से भक्तों का पोषण करती हो और पृथ्वी पर भक्तों को पोषण करने के अर्थ तुम्हार छाया रूप है। सतयुग, त्रेता, द्वापर युग पर्यन्त तो मुक्ति, ज्ञान और वैराग्य सहित तुम इस पृथ्वी पर आनन्द पूर्वक स्थित रही हो। अब कलियुग में पाखंण्डियों के पाखण्ड से दुःखित होकर मुक्ति तो वहाँ से उठकर चैकुण्ठ को चली गई है, परन्तु जिस समय तुम उसको समरण करती हो तो तुम्हारे स्मरण मात्र से ही वह उसी समय तुम्हारे समीप आकर उपस्थित हो जाती है और तुमने ज्ञान वेरा्य को अपना पुत्र जानकर अपने समीप ही रक्खा है । यद्यपि इस कलियुग के बीच दुराचारियों के त्याग करने से तुम्हारे दोनों पुत्र मन्द और वृध्द हो गये हैं, तथापि तुम चिंता मत करो, इसका में उपाय सोचता हूँ। यद्यपि कलियुग के समान काल काल दूसरा नहीं है, तथापि हे सुमुखि ! इस युग में तुमको घर-घर में प्रत्येक मनुष्य के हृदय में स्थापन करूँगा । इस कलिकाल में जो पुरुष अभियुक्त होवेंगे वे पुरुष चाहे पापी क्यों न हों तो भी निर्भय होकर कृष्ण मंदिर को जावेंगे। जिन पुरुषों के चित्त में भक्ति होगी, वे यमराज नहीं देखेंगे।।भक्तियुक्त मन वाले पुरुषों का पराभव करना तो दूर रहा प्रेत, पिशाच,
राक्षस अथवा असुर इनमें से कोई भी उनको स्पर्श करने में भी समर्थ नहीं होंगे। सूतजी बोले कि इस प्रकार नारदजी के कहे हुए अपने माहात्म्य को सुनकर भक्ति सब अङ्गों से पुष्ट होकर नारदजी से यह वचन बोली। आप धन्य हो, जो आपकी मुझमें अचल प्रीति है, अब मैं आपको कभी नहीं छोडूगी, सदा आपके हृदय में स्थित रहूँगी।।


अध्याय २
(३)
हे साधु! आप दयालू ने तो मेरा कष्ट क्षन्मात्र में ही हर लिया परन्तु इन ज्ञान वैराग्य नामक पत्रों को चेत नहीं हुआ सो इन्हें सचेत करो। श्री नारद मनि ने भक्ति का यह वचन सुनकर उन दोनों ज्ञान और वैराग्य को अपने हाथ से सहारा देकर जगाने लगे! जब इस प्रकार वे न जागे, तब कान के निकट मुख लगा कर नारदजी ने उच्च स्वर में कहा कि हे जान ! हे वैराग्य! शीघ्र जागो। इस प्रकार पुकारने से उन्होंने जब नेत्र न खोले तब नारदजी ने वेद वेदान्त के शब्द सुनाकर बारम्बार जगाया तब वे दोनों बलपूर्वक कठिनता से उठे। किन्तु निर्बल होने के कारण फिर गिरे पड़े, उनकी यह दशा वख कर नारदजी को चिन्ता उत्पन्न हुई और वह भगवान का स्मरण करने लगे। भगवान का स्मरण करते ही आकाशवाणी हुई कि हे तपोधन ! चिन्ता मत करो, तुम्हारा उद्यम सफल होगा, इसका निमित्त तुम सत्कर्म आरम्भ करो और वह सत्कर्म तुमसे महात्मा लोग वर्णन करेंगे। सत्कर्म करने मात्र से ही इन दोनों को निद्रा सहित बृद्धता जाती रहेगी। इस वाणी को सुनकर नारद जी विस्मित होकर विचार करने लगे कि-- महात्मा जन कहाँ मिलेंगे और साधन किस प्रकार देंगे। सूतजी बोले कि नारदमुनि इसी सोच विचार में उन दोनों को वहीं छोड़कर महात्मा साधुओं को खोजने को चल दिये और तीर्थों में जाकर मार्ग में मुनीशवरो से पूछने लगे। नारदजी के वृत्तांत को सबने सुना, परन्तु किस न ठीक उत्तर नहीं दिया। तब नारदजी चिंतित होकर वदरी बन में आये, और यह निश्चय किया कि मैं यहाँ तप करूगा ! इतने में सूर्य के समान तेजवाले सनक आदि मुनियों को अपने सन्मुख खड़े देखकर नारदजी बोले कि हे मुनीश्वरो ! इस समय बड़े भाग्य से आपका समागम हुआ । आप सब प्रकार बुद्धिमान, शास्त्रवक्ता और योगीराज हो, और सबसे पहले उत्पन्न होने पर भी सदा पाँच वर्ष के ही बने रहे हो। आप बैकुण्ठ में रहकर
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हरि भगवान के गुणानुवाद गाते रहे हो, और भागवत कथाअमृतरुपी रस से मत्त होकर केवल एक कथा मात्र से ही जीते हो और हरि शरणम् ऐसा वचन आपके मुख से निकलता रहता है। अतएव काल की भेजी जरा आपको बाधा नहीं कर सकती । आपके केवल भृकुटी मात्रा के चढ़ाने से भी पहले नारायण के जय विजय नामक द्वारपाल पृथ्वी में आय दैत्यो की योनि को प्राप्त हुए फिर आप ही की कृपा से शीघ्र वेकुण्ठधाम को गये।। मेरा अहोभाग्य है कि जिससे आपके दर्शन हुए हैं सो आप कृपा करके मेरा निवारण कीजिये। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को सुख किस प्रकार प्राप्त होगा और सब वर्णों में किस प्रकार प्रेम पूर्वक उनका स्थापन होगा? यह सुनकर सनत्कुमार बोले-हे नारद! आप किसी प्रकार की चिंता मत करो। आप धन्य हो और विरक्तजनों में अग्रणी तथा योग का प्रकाश करने को सुर्य समान हो। आप भगवदभक्त हो इस कारण आप भक्ति को स्थापन करो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। पूर्व समय के ऋषियों ने लोक में अनेक-अनेक मार्ग प्रकट किये हैं परन्तु वे सब कष्ट-साध्य हैं और प्रायः स्वर्ग ही का फल देन वाले हैं। परन्तु हे नारद जी! जो वैकुण्ठ का साधक मार्ग है, वह तो अत्यन्त गुप्त है, इस मार्ग को बताने वाला पुरुष तो प्रायः भाग्य से प्राप्त होता है। आकाशवाणी से जो पहिले तुमको सत्कर्म का उपदेश किया है, सो हम कहते हैं, स्थिर चित्त से प्रसन्न होकर सुनो। जो द्रव्ययज्ञ, तप, योग, स्वाध्याय तथा ज्ञानयज्ञ हैं, यह सब कर्म फल से स्वर्ग आदि के देने वाले हैं। इनमें विद्वानों न सत्कर्म को जताने वाला ज्ञानयज्ञ कहा है। वह यज्ञ श्रीमद्भागवत है जो शुकदेव आदि महात्माओं ने कथन किया है। श्रीमद्भागवत के सुनने से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य इनका बल बढ़ जावेगा। उन दोनों का दुःख दूर हो जावेगा और भक्ति सुखी हो जायगी। श्रीमद्भागवत को ध्वनि से कलियुग के यह सबदोष इस प्रकार नाश


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हो जावेगे जैसे सिंह के शब्द से भेड़िए भाग जाते हैं । नारदजी--बोले कि जब वेद वेदांत के शब्द और गीता पाठ से भी भक्ति ज्ञान और वैराग्य सचेत नहीं हुए, तो अब श्रीमद्भागवत की कथा से कैसे सचेत हो जायेंगे, क्योंकि उसमें श्लोक-श्लोक और पद पद में भी वेदार्थ ही दर्शाया है। हे महात्माजी आपका ज्ञान अमोघ है, इस कारण कृपा करके आप मेरे सन्देह को दूर करो। यह सुनकर सनत्कुमार बोले कि श्रीमद्भागवत की कथा वेद के शीर्ष रूप उपनिषदों का सार लेकर रची गई है, इस कारण यह कथा सबसे उत्तम है। वेदान्त, शास्त्र और वेद में अति निर्गुण भगवद्गीता के कर्ता श्री वेदव्यासजी भी जिस समय अजान रूप सागर में मोहित होने के कारण दुःख को प्राप्त हुए, उस समय तुमने जाकर चतुःश्लोक की भागवत जो ब्रह्माजी से तुमको प्राप्त हई थी वह सुनाई। उसको सुनते ही वेदव्यास जी की सब व्याधा तुरन्त दूर होगई उन्हीं चार श्लोकों को लेकर व्यासजी ने यह श्रीमद्भागवत बनाया वह शुकदेव जी ने उनसे श्रवण किया। उसी कथामृत से आप ज्ञान वैराग्य को सचेत कीजिए ।

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