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सृष्टि विस्तर अर्थ ब्रह्मा जी द्वारा किये गये कर्म एवं देह त्याग।


श्रीमद भागवद पुराण बीसवां अध्याय[स्कंध ३]


दोहा-स्वयंभुव मनु के वश से भयौ जगत विस्तार।

सो सब या अध्याय में बनू कथा उचार ।।

( सृष्टि विस्तार )

हिरण्यक्ष वध

श्री मैत्रेय जी बोले-हे विदुर जी ! हिरण्याक्ष के मरने पर देवता गण अत्यन्त प्रसन्न हुये और भगवान बाराहजी पर पुष्पो की वर्षा करते हुये, अपना मनोरथ पूर्ण हुआ जानकर आनन्द के बाजे बजाने लगे। सब देवताओं सहित वृह्माजी ने श्री बाराह भगवान के समीप जाकर इस प्रकार से स्तुति की, हे अनादि पुरुष वाराह जी ! आपने देवता, सत्पुरुष, ब्राह्मण एवं यज्ञादि की रक्षा करने के निमित्त इस दुष्ट पापाचारी हिरण्याक्ष राक्षस का संहार किया है। आपने ही पृथ्वी को पाताल से निकाल कर जल पर स्थित किया हैं। हे प्रभु ! अब आपकी ही कृपा से सब जीव इस पृथ्वी पर रह कर आनन्द सहित यज्ञ, जप, तप, पूजा एवं दान आदि कर्म किया करेंगे। हे दीनबन्धु! उस दैत्य हिरण्याक्ष के समय में यज्ञ में देवता तथा पितरों को भाग नहीं मिलता था। अब वे सभी देवता तथा पितर अपना-अपना भाग प्राप्त करके आनन्द सहित आपका स्मरण किया करेंगे। जब वृह्माजी सभी देवता और ऋषियों सहित स्तुति कर चुके तो पश्चात पृथ्वी स्त्री स्वरूप धारण कर श्री बाराह भगवान के समुख आ इस प्रकार से स्तुति करने लगी। हे ज्योतिर्मय! आपने मुझे पाताल से निकाल कर जल के ऊपर स्थापति किया है। आपके रचित संसार के सभी छोटे बड़े जीव मेरे ऊपर पाँव रखते हैं। परन्तु आपने मुझे अपने पवित्र दाँतों पर उठाया है, अतः मैं इसी कारण अपने आपको अत्यन्त परम कृतार्थ मानती हूँ। हे प्रभु ! आपके चरणों की छाया सम्पूर्ण जगत पर पड़ी है, सो हे नाथ ! मैं इस बात से बहुत भयभीत हूँ कि जब कलिका् आवेगा तो उसके प्रभाव से जगत के जीव जंतु अधिकाश अत्यन्त पापी हो जायेंगे। धर्म कर्म त्याग अशुभ कर्मों में प्रवृत्ति हो भक्ति से विमुख हो, हरिभक्तो से शत्रुता करेंगे। सभी मनुष्य इन्द्रियों को सुख देने के लिये स्वार्थ पूर्ण मित्रता करेंगे। सो उस क्लेश वाले कलियुग में आप मेरी रक्षा करना । तब पृथ्वी को विनय सुनकर वाराह भगवान ने कहा-है पृथ्वी ! तू इन बातों से भय भीत मत हो अधर्मियों के कारण तेरे ऊपर पापों का भार बढ़ेगा तब हम सगुण हो अवतार धारण कर अधर्मियों का नाश करके तुझे सुख प्रदान करेंगे।

जब सूतजी ने शौनकादिक ऋषियों को यह मैत्रैय जी के द्वारा विदुर जी को सुनाये सम्बाद को कहा तो सभी ऋषियों ने पूछा कि वाराह भगवान पृथ्वी को पाताल से लेकर जल पर स्थापित करके जब अपने लोक को चले गये तो पृथ्वी पर संसार के प्राणियों तथा अन्य सभी वस्तुओं की रचना किस प्रकार से हुई सो कथा प्रसंग सुनाइये कि किस प्रकार मैत्रेय जी ने विदुरजी से कहा था। तब श्री सूतजी बोल हे ऋषियों वराह अवतार की कथा सुनने से विदुर जी को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, तब उन्होंने मैत्रैय जी से पूछा हे वृहान् ! वृह्माजी ने प्रजा को उत्पन्न करने के लिये प्रजापतियों को उत्पन्न करके किस प्रकार से सृष्टि की रचना की सो समस्त कथा मुझसे कहिये। इस प्रकार विदुर जी द्वारा पूछने पर श्रीमैत्रेय जी बोले-हे विदुर जी ! जो किसी के करने में नहीं आवे वह देव अर्थात प्रकृति का अधिष्ठाता, महापुरुष, और काल, इनसे निर्विकार प्रभु को जब सत, रज, तम अहंकार से शब्द आदि पंच भूत मात्रा और आकाशादि पाँच महाभूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँव कर्मेन्द्रियाँ प्रकट हुये। किन्तु इन सबसे प्रकट होने पर भो अलग अलग रहने के कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हिरण्यमय अंडकोष की रचना हुई। वह चेष्टा रहित अण्डकोष कुछ हजार वर्षों तक समुद्र के जल में ही पड़ा रहा, तब उस अण्डकोष में परमात्मा ने प्रवेश किया जिससे वह अण्डकोष चेतन्य स्वरूप होगा। वही प्रथम जल में नारायण स्वरूप प्रकट हुये, जिनकी नाभि में से एक कमल उत्पन्न हुआ और उसी कमल में से वृम्हा उत्पन्न हुये। तब उन्होंने भगवान की चेतना शक्ति प्राप्त करके सबसे प्रथम अपनी छाया से तामिस्र, अंधतामिस्र,तम, मोह, महातम इन पांच पर्व की रचना को । तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने उस शरीर को त्याग दिया सो उससे रात्रि की उत्पत्ति हुई जो क्षुधा, तृषा को प्रवृति करने वाली हुई, उसे यक्ष राक्षस ने ग्रहण कर लिया। तब वे राक्षस भूख प्यास से थकित होकर ब्रह्माजी को ही खाने को दौड़े तब उनके भक्षण के लिये कुछ ने कहा था इनका भक्षण करो और कुछ ने कहा था रक्षा मत करो इस प्रकार जिनने भक्षण करने को कहा था वे यक्ष हुये और जिनने रक्षा को मना किया था वे राक्षस हुये। फिर ब्रह्माजी ने अपनी कान्ति से जिन-जिन देवताओं को प्रधान से उत्पन्न किया है, उन-उन देवताओं ने प्रकाशित तेज को क्रीड़ा करके ग्रहण किया वह तेज प्रकाश रूप दिन हुआ। तदनन्तर ब्रह्माजी ने अपनी माया से असुरों को उत्पन्न किया सो वे स्त्री लंपट होने के कारण लाज त्याग ब्रह्माजी के साथ ही मैथुन करने को कटिवद्ध हुये, तब वे अपने को किसी प्रकार सुरक्षित न देखकर अपने बचाव के लिये दौड़े और हरि भगवान नारायण से प्रार्थना की कि हे पुरुषोत्तम नारायण ! आपके कहने से प्रजा उत्पन्न की परन्तु यह तो मेरे ही साथ मैथुन करना चाहते है सो कृपा कर इनसे मेरी रक्षा करो। तब भगवान ने ब्रह्माजी से वह काया छोड़ देने को कहा सो ब्रह्माजी ने अपनी वह काया भी त्याग दी सो उस काया से सन्ध्या नाम वाली एक स्त्री स्वरूप उत्पन्न हुई। जो अत्यन्त छवियुक्त सुन्दर थी, उसे देख कर वे दैत्य मोहित हो गये और बोले-हे रम्भीरू! तुम कौन हो, और यहाँ क्यों फिर रहे हो, तुम्हारे पिता कौन हैं इस प्रकार कहकर अनेक प्रकार से उसके रूप की बड़ाई करते हुये अपनी-अपनी कहने लगे। उन मूर्ख असुरों ने उस सायंकल को सन्ध्या को स्त्री मानकर पकड़ लिया। फिर वृहमा जी ने अपने शरीर से शरीर को सूघती हुई कांन्ति करके गंधर्व और अप्सराओं के गुण उत्पन्न किये। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने अपने उस शरीर को त्याग दिया, जिसे विश्वास आदि गंधर्वों ने प्रोति करके उसे ग्रहण कर लिया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने अपने आलस्य से भूत पिशाचों को रचा पश्चात अपने नेत्र बन्द कर उस शरीर को भी त्याग दिया अर्थात उस जृभंण नामक शरीर को भूतादिकों ने गृहण कर लिया। फिर वृम्हाजीने अपनी आत्मा को भगवान मान कर अपने अदृश्य स्वरूप से साध्य संज्ञक और पितृ संज्ञक देव गुणों की रचना की। पश्चात अपनी अन्तर्धान शक्ति से ब्रह्मा जी ने सिद्ध और विद्याधर को उत्पन्न किया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने अपने प्रतिबिंब से किन्नर और किम्पुरुषों को उत्पन्न किया उन्होंने ब्रह्माजी द्वारा प्रतिबिंब रूपी शरीर को त्यागने पर उसे ग्रहण कर लिया। पश्चात ब्रह्माजी ने अनेक यत्न किये परन्तु कोई सृष्टि न बढ़ी तब वृम्हाजी बहुत चिन्ता करके हाथ पाँव पसार के सो गये, तत्पश्चात क्रोध में उस शरीर को भी छोड़ दिया, उस शरीर से जो छोटे छोटे केश गिरे उनसे महि नामक छोटे छोटे सर्प प्रगट हुये, और हाथ पैरों के पसारने सेअजगर सर्प जो बहुत वेग से चलते हैं, ऐसे बड़े फन वाले व बड़ी गर्दन वाले तेज सर्प उत्पन्न है। पश्चात वृम्हा जी ने अपने आपको जब कृतार्थ माना तब अपने मन से चौदह मनु उत्पन्न किये । फिर उन मनु पुरुषों के अर्थ अपनी देह स्वरूप समर्पण किया। सब मनुओं की सृष्टि को देख कर प्रथम उत्पन्न भये ये ब्रह्मा जी की प्रशंसा करने लगे।

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