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श्रीमद भागवद पुराण *पाँचवाँ अध्याय * [स्कंध ४]।रूद्र अवतार एवं स्वरूप।। दक्ष यज्ञ विध्वंस।। दक्ष वध।।

 


Virbhadra,Shiva,Daksh,Deva,Vidhur,Bhojshala,Bhrigu,Mount Kailash,Parikshit,  श्रीमद भागवद पुराण *पाँचवाँ अध्याय * [स्कंध ४] दोहा- किया दक्ष यज्ञ आय जिमी, वीर रूद्र शिव गण। सो पंचम अध्याय में, कथा कही समझाय।। दक्ष यज्ञ विध्वंस।। दक्ष वध।।   श्री शुकदेव मुनि कहने लगे कि है परिक्षित! जब विदुर जी को यह प्रसंग मैत्रेय जी ने सुनाया तो विदुर जी ने पूछा -हे मुने ! जब सती जी दक्ष के यहाँ देह त्याग कर गई तो शंकर भगवान के गणों ने दक्ष यज्ञ विवंश करना चाहा, परन्तु भृगु द्वारा उत्पन्न किये गये ऋभु नामक देवताओं ने उन्हें भोजशाला से मार मार कर बाहर निकाल दिया था। सो हे प्रभू ! वह शिव गण वहां से भाग कर कहाँ गये? और आगे क्या हुआ? सो सब कथा मुझे कृपा कर सुनाईये। तब मेत्रैय जी बोले-हे विदुर जी ! दक्ष द्वारा निरादर से सती द्वारा देह त्याग और अपने पार्षदों का ऋभुओं द्वारा भगा देने का समाचार भगवान शंकर जी ने जब नारद जी के मुखारविंद से सुना तो उन्हें अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ जिसके कारण शिव ने अपने ओठों को दाँतों से दवा कर भयानक रूप से भारी अठ्हास करते हुये गंभीर नाद किया, और भूल से लिप्त अपनी जटाओं में से एक महातेज वाली जटा को उखाड़ कर पृथ्वी पर पटक कर देमारा।  रूद्र अवतार एवं स्वरूप।।    जिसके पटकने से तुरन्त वहाँ मेघ के समान वर्ण वाला, हजार भुजा वाले, बहुत बड़ी देह वाला स्वर्ग तक लम्बा और सूर्य के समान तीन नेत्र वाला जिसकी दाड़े महा विक्राल, और केश अग्नि के समान प्रज्वल्लित मुन्डों की माला पहिने हुये अनेक प्रकार के अस्त्रों को हाथों में लिये एक वीरभद्र नाम का रुद्र का गण प्रकट हो गया । वह वीरभद्र शिव गण तुरन्त शिव जी के सामने हाथ जोड़ कर बोला-हे प्रभु मैं आपका किंकर हूँ आज्ञा दीजिये कि मैं क्या कार्य करें। शिव जी बोले-हे रूद्र रूप धारी वीर भद्र नामक वट! तू मेरे समस्त पार्षदों में प्रधान है क्योंकि तू मेरे अंश से प्रगट हुआ है, तुझ बिन दक्ष को अन्य कोई मार न सकेगा। अतः तू अब मेरी आज्ञा से यज्ञ सहित प्रजापति दक्ष का नाश कर दे ।   सो हे विदुर जी! शिव जी की आज्ञा प्राप्त कर वह महावली भयानक वीरभद्र नाम का भगवान शंकर जी का मुख्य पार्षद अपने साथ शिव जी के सभी पार्षदों को साथ ले हाथ में विनाश कारी त्रिशूल धारण कर सीधा दक्ष के यज्ञ को ओर चल वाया। जिस समय वीर भद्र अपने साथ रुद्र गणों को साथ लिये भारी नाद करता हुआ यज्ञ स्थल के समीप पहुँचा तो उस समय यज्ञ में उपस्थित ऋत्वज तथा दक्ष और सभी सभा सद ब्राह्मण एवं ब्रह्माणियाँ दक्ष की रानी आदि जितनी स्त्रियां वहाँ पर उप स्थित थी, वे सब उत्तर दिशा में उड़ती हुई धूल को देखकर विचार करने लगे कि यह धूल कहाँ से आ रही है और अंधकार सा क्यों बढ़ता चला जारहा है । इस समय पवन भी नहीं चल रही है, और न प्राचीन राजा दंड देने वाला बर्हि ही जीवित है, इस समय गायें भी लौट कर नहीं आ रही हैं, और न कहीं चोर ही आते दिखाई देते हैं, फिर यह धूल कहां से और क्यों उड़ती हुई चली आती है। कुछ परस्पर महात्मा  लोग इस प्रकार बात करने लगे कि ज्ञात होता है, यह सब सती का अपमान कर दक्ष ने अपनी पुत्र को अग्नि में जलने दिया, उसी पाप का फल है। जो भगवान शंकर प्रलय काल में अपने जटा जूट विखेर कर त्रिशूल की नोंक से दिग्गजों को छेद डालते हैं, तथा अस्त्र शस्त्र भुजाओं में धारण कर नृत्य करते हैं, जो केवल उच्च अट्टहास से ही दशों दिग्गजों को विदीर्ण कर देते है, अपनी भयंकर दाढ़ों से तारा गणों को नाश कर देते हैं। सो एसे असहनीय तेज वाले भगवान शंकर जी को  कंपायमान करके मानव तो क्या स्वयं ब्रह्मा भी सुख नहीं पा सकते है हे विदुर जी ! इधर देवता, महात्मा, तथा यज्ञ में उपस्थित सभी सभासद ऋषि मुनि जो भी उपस्थित थे वे सब इस प्रकार नाना प्रकार की बातें करते थे, कि तब तक वीर भद्र के साथ शिव गण नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र धारण कर अनेक प्रकार के शरीर एवं आकृति वालों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ स्थल को चारों  ओर से आकर घेर लिया। वे नाना प्रकार जो जी में आता उसी प्रकार के उपद्रव करने लगे। किसी ने पत्नी शाला को नष्ट कर दिया तो किसी ने अग्नी शाला का नाश कर डाला, किसी ने पाक भोजन शाला का विध्वंस कर डाला, किसी ने यज्ञ की अग्नी को ही बुझा दिया, किसी ने वेदी और मेखला को ही तोड़ डाला, कुछ शिव गण स्त्रियों के समूह में जाकर उन्हें अपना भयानक भेष दिखा कर भय भीत किया, कुछ ने यज्ञ मंडल को तोमें उखाड़ कर यज्ञ शाला से बाहर फेंक दिया, कुछ ने यज्ञ मंडप को तोड़ मरोड़ कर विध्वंश कर दिया, कुछ ने यज्ञ के पात्रों को तोड़ फोड़ कर तहस नहस कर दिया, कुछ ने अग्नि कुंड तथा जल कुन्ड़ों में मल मूत्र कर दिया, शिव गण ऋषि मुनियों को मारने पीटने एवं दुख देने लगे। कुछ ने देवताओं को और मुनियों ऋषियों को पकड़-पकड़ कर बुरी दुर्दशा करना आरम्भ कर दिया । अभिमान नामक शिव गण ने भृगु ऋषि को बाँध लिया, तथा वीर भद्र ने दक्ष को, तथा चंदेश्वर ने पूषा देव को, और नंदीश्वर ने भगदेव को पकड़ लिया। अनेकों शिव गण पत्थरों की वर्षा करने लगे, जिसके कारण ऋत्विज, सभासद, देवता आदि पीड़ित हो इधर उधर भागने लगे तब यह दारुण दुख देख कर भृगु मुनि ने फिर कुशा हाथ में ले हवन कर ऋभु देवों को प्रकट करना चाहा जिस के किये आकर शिव गणों से उन सब की रक्षा कर सकें। परन्तु उसी क्षण वीर भद्र ने भृगु को पकड़ कर मार पीट शुरू करदी, और उस भृगु की दाड़ी मूछं उखाड़लीं क्योंकि जिस समय भगवान शकर को सभा में दक्ष ने खोटे बचन कहे थे उस समय भृगु ने दाड़ी हिला कर हंसते हुये मूंछों पर हाथ फेरा था। इधर भगदेवता भी अपनी रक्षा के लिये इधर उधर भागने लगा तो बीर भद्र ने उसे भी पकड़ लिया और उसकी दोनों आँखें फोड़ डाली। उसे धरती पर पटक दिया। क्योंकि शिव शाप के समय इसने भी दक्ष की ओर से सैन चलाते हुए भगवान शंकर की निंदा की थी । शिव शाप के समय पूषा देवता दाँत दिखा कर ठहा कल हँसा था, तथा शिव जी की निंदा की थी, इसी कारण वीरभद्र पूषा देवता को पकड़ मारा पीटा और पृथ्वी पर पटक कर उसके सब दांत उखाड़ डाले । तत्पश्चात वीर भद्र ने क्रोधित हो प्रजापति को पकड़ कर पृथ्वी पर देमारा और अपने अस्त्र शस्त्रों से उसके गले को काटने लगा। परन्तु उस समय वीर भद्र को अत्यंत विस्मय हुआ कि जब दक्ष का सिर किसी भी अस्त्र शस्त्र से किंचित मात्र भी न कटा, तो वह बारम्बार अपने मन में यह विचार करने लगा कि इस दक्ष का सिर इन अस्त्र शस्त्र से क्यों नहीं कट रहा है। वह बहुत काल तक विचार करता रहा, तब उसने सोचा कि इस यज्ञ में पशु को गला घोंट कर मारते हैं। अतः इसी प्रकार दक्ष को भी मारना चाहिये। ऐसा विचार कर दक्ष को वीर भद्र ने गर्दन मरोड़ कर सिर को झटका मार कर धड़ से उलग करके मार डाला, और उस दक्ष के अलग किये हुथे शिर को दक्षिण अग्नि वाले होम कुन्ड में डाल कर होम कर दिया। तत्पश्चात सारी यज्ञ शाला और वहाँ की सब सामिग्री को नष्ट कार दिया । पश्चात अपने सब शिव गणों को साथ लिये विजय नाद करता हुआ शिव जी के पास कैलाश पर्वत पर चला आया।


श्रीमद भागवद पुराण *पाँचवाँ अध्याय * [स्कंध ४]

दोहा- किया दक्ष यज्ञ आय जिमी, वीर रूद्र शिव गण।

सो पंचम अध्याय में, कथा कही समझाय।।

दक्ष यज्ञ विध्वंस।। दक्ष वध।।

Virbhadra,Shiva,Daksh,Deva,Vidhur,Bhojshala,Bhrigu,Mount Kailash,Parikshit,  श्रीमद भागवद पुराण *पाँचवाँ अध्याय * [स्कंध ४] दोहा- किया दक्ष यज्ञ आय जिमी, वीर रूद्र शिव गण। सो पंचम अध्याय में, कथा कही समझाय।। दक्ष यज्ञ विध्वंस।। दक्ष वध।।   श्री शुकदेव मुनि कहने लगे कि है परिक्षित! जब विदुर जी को यह प्रसंग मैत्रेय जी ने सुनाया तो विदुर जी ने पूछा -हे मुने ! जब सती जी दक्ष के यहाँ देह त्याग कर गई तो शंकर भगवान के गणों ने दक्ष यज्ञ विवंश करना चाहा, परन्तु भृगु द्वारा उत्पन्न किये गये ऋभु नामक देवताओं ने उन्हें भोजशाला से मार मार कर बाहर निकाल दिया था। सो हे प्रभू ! वह शिव गण वहां से भाग कर कहाँ गये? और आगे क्या हुआ? सो सब कथा मुझे कृपा कर सुनाईये। तब मेत्रैय जी बोले-हे विदुर जी ! दक्ष द्वारा निरादर से सती द्वारा देह त्याग और अपने पार्षदों का ऋभुओं द्वारा भगा देने का समाचार भगवान शंकर जी ने जब नारद जी के मुखारविंद से सुना तो उन्हें अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ जिसके कारण शिव ने अपने ओठों को दाँतों से दवा कर भयानक रूप से भारी अठ्हास करते हुये गंभीर नाद किया, और भूल से लिप्त अपनी जटाओं में से एक महातेज वाली जटा को उखाड़ कर पृथ्वी पर पटक कर देमारा।  रूद्र अवतार एवं स्वरूप।।    जिसके पटकने से तुरन्त वहाँ मेघ के समान वर्ण वाला, हजार भुजा वाले, बहुत बड़ी देह वाला स्वर्ग तक लम्बा और सूर्य के समान तीन नेत्र वाला जिसकी दाड़े महा विक्राल, और केश अग्नि के समान प्रज्वल्लित मुन्डों की माला पहिने हुये अनेक प्रकार के अस्त्रों को हाथों में लिये एक वीरभद्र नाम का रुद्र का गण प्रकट हो गया । वह वीरभद्र शिव गण तुरन्त शिव जी के सामने हाथ जोड़ कर बोला-हे प्रभु मैं आपका किंकर हूँ आज्ञा दीजिये कि मैं क्या कार्य करें। शिव जी बोले-हे रूद्र रूप धारी वीर भद्र नामक वट! तू मेरे समस्त पार्षदों में प्रधान है क्योंकि तू मेरे अंश से प्रगट हुआ है, तुझ बिन दक्ष को अन्य कोई मार न सकेगा। अतः तू अब मेरी आज्ञा से यज्ञ सहित प्रजापति दक्ष का नाश कर दे ।   सो हे विदुर जी! शिव जी की आज्ञा प्राप्त कर वह महावली भयानक वीरभद्र नाम का भगवान शंकर जी का मुख्य पार्षद अपने साथ शिव जी के सभी पार्षदों को साथ ले हाथ में विनाश कारी त्रिशूल धारण कर सीधा दक्ष के यज्ञ को ओर चल वाया। जिस समय वीर भद्र अपने साथ रुद्र गणों को साथ लिये भारी नाद करता हुआ यज्ञ स्थल के समीप पहुँचा तो उस समय यज्ञ में उपस्थित ऋत्वज तथा दक्ष और सभी सभा सद ब्राह्मण एवं ब्रह्माणियाँ दक्ष की रानी आदि जितनी स्त्रियां वहाँ पर उप स्थित थी, वे सब उत्तर दिशा में उड़ती हुई धूल को देखकर विचार करने लगे कि यह धूल कहाँ से आ रही है और अंधकार सा क्यों बढ़ता चला जारहा है । इस समय पवन भी नहीं चल रही है, और न प्राचीन राजा दंड देने वाला बर्हि ही जीवित है, इस समय गायें भी लौट कर नहीं आ रही हैं, और न कहीं चोर ही आते दिखाई देते हैं, फिर यह धूल कहां से और क्यों उड़ती हुई चली आती है। कुछ परस्पर महात्मा  लोग इस प्रकार बात करने लगे कि ज्ञात होता है, यह सब सती का अपमान कर दक्ष ने अपनी पुत्र को अग्नि में जलने दिया, उसी पाप का फल है। जो भगवान शंकर प्रलय काल में अपने जटा जूट विखेर कर त्रिशूल की नोंक से दिग्गजों को छेद डालते हैं, तथा अस्त्र शस्त्र भुजाओं में धारण कर नृत्य करते हैं, जो केवल उच्च अट्टहास से ही दशों दिग्गजों को विदीर्ण कर देते है, अपनी भयंकर दाढ़ों से तारा गणों को नाश कर देते हैं। सो एसे असहनीय तेज वाले भगवान शंकर जी को  कंपायमान करके मानव तो क्या स्वयं ब्रह्मा भी सुख नहीं पा सकते है हे विदुर जी ! इधर देवता, महात्मा, तथा यज्ञ में उपस्थित सभी सभासद ऋषि मुनि जो भी उपस्थित थे वे सब इस प्रकार नाना प्रकार की बातें करते थे, कि तब तक वीर भद्र के साथ शिव गण नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र धारण कर अनेक प्रकार के शरीर एवं आकृति वालों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ स्थल को चारों  ओर से आकर घेर लिया। वे नाना प्रकार जो जी में आता उसी प्रकार के उपद्रव करने लगे। किसी ने पत्नी शाला को नष्ट कर दिया तो किसी ने अग्नी शाला का नाश कर डाला, किसी ने पाक भोजन शाला का विध्वंस कर डाला, किसी ने यज्ञ की अग्नी को ही बुझा दिया, किसी ने वेदी और मेखला को ही तोड़ डाला, कुछ शिव गण स्त्रियों के समूह में जाकर उन्हें अपना भयानक भेष दिखा कर भय भीत किया, कुछ ने यज्ञ मंडल को तोमें उखाड़ कर यज्ञ शाला से बाहर फेंक दिया, कुछ ने यज्ञ मंडप को तोड़ मरोड़ कर विध्वंश कर दिया, कुछ ने यज्ञ के पात्रों को तोड़ फोड़ कर तहस नहस कर दिया, कुछ ने अग्नि कुंड तथा जल कुन्ड़ों में मल मूत्र कर दिया, शिव गण ऋषि मुनियों को मारने पीटने एवं दुख देने लगे। कुछ ने देवताओं को और मुनियों ऋषियों को पकड़-पकड़ कर बुरी दुर्दशा करना आरम्भ कर दिया । अभिमान नामक शिव गण ने भृगु ऋषि को बाँध लिया, तथा वीर भद्र ने दक्ष को, तथा चंदेश्वर ने पूषा देव को, और नंदीश्वर ने भगदेव को पकड़ लिया। अनेकों शिव गण पत्थरों की वर्षा करने लगे, जिसके कारण ऋत्विज, सभासद, देवता आदि पीड़ित हो इधर उधर भागने लगे तब यह दारुण दुख देख कर भृगु मुनि ने फिर कुशा हाथ में ले हवन कर ऋभु देवों को प्रकट करना चाहा जिस के किये आकर शिव गणों से उन सब की रक्षा कर सकें। परन्तु उसी क्षण वीर भद्र ने भृगु को पकड़ कर मार पीट शुरू करदी, और उस भृगु की दाड़ी मूछं उखाड़लीं क्योंकि जिस समय भगवान शकर को सभा में दक्ष ने खोटे बचन कहे थे उस समय भृगु ने दाड़ी हिला कर हंसते हुये मूंछों पर हाथ फेरा था। इधर भगदेवता भी अपनी रक्षा के लिये इधर उधर भागने लगा तो बीर भद्र ने उसे भी पकड़ लिया और उसकी दोनों आँखें फोड़ डाली। उसे धरती पर पटक दिया। क्योंकि शिव शाप के समय इसने भी दक्ष की ओर से सैन चलाते हुए भगवान शंकर की निंदा की थी । शिव शाप के समय पूषा देवता दाँत दिखा कर ठहा कल हँसा था, तथा शिव जी की निंदा की थी, इसी कारण वीरभद्र पूषा देवता को पकड़ मारा पीटा और पृथ्वी पर पटक कर उसके सब दांत उखाड़ डाले । तत्पश्चात वीर भद्र ने क्रोधित हो प्रजापति को पकड़ कर पृथ्वी पर देमारा और अपने अस्त्र शस्त्रों से उसके गले को काटने लगा। परन्तु उस समय वीर भद्र को अत्यंत विस्मय हुआ कि जब दक्ष का सिर किसी भी अस्त्र शस्त्र से किंचित मात्र भी न कटा, तो वह बारम्बार अपने मन में यह विचार करने लगा कि इस दक्ष का सिर इन अस्त्र शस्त्र से क्यों नहीं कट रहा है। वह बहुत काल तक विचार करता रहा, तब उसने सोचा कि इस यज्ञ में पशु को गला घोंट कर मारते हैं। अतः इसी प्रकार दक्ष को भी मारना चाहिये। ऐसा विचार कर दक्ष को वीर भद्र ने गर्दन मरोड़ कर सिर को झटका मार कर धड़ से उलग करके मार डाला, और उस दक्ष के अलग किये हुथे शिर को दक्षिण अग्नि वाले होम कुन्ड में डाल कर होम कर दिया। तत्पश्चात सारी यज्ञ शाला और वहाँ की सब सामिग्री को नष्ट कार दिया । पश्चात अपने सब शिव गणों को साथ लिये विजय नाद करता हुआ शिव जी के पास कैलाश पर्वत पर चला आया।



श्री शुकदेव मुनि कहने लगे कि है परिक्षित! जब विदुर जी को यह प्रसंग मैत्रेय जी ने सुनाया तो विदुर जी ने पूछा -हे मुने ! जब सती जी दक्ष के यहाँ देह त्याग कर गई तो शंकर भगवान के गणों ने दक्ष यज्ञ विवंश करना चाहा, परन्तु भृगु द्वारा उत्पन्न किये गये ऋभु नामक देवताओं ने उन्हें भोजशाला से मार मार कर बाहर निकाल दिया था। सो हे प्रभू ! वह शिव गण वहां से भाग कर कहाँ गये? और आगे क्या हुआ? सो सब कथा मुझे कृपा कर सुनाईये। तब मेत्रैय जी बोले-हे विदुर जी ! दक्ष द्वारा निरादर से सती द्वारा देह त्याग और अपने पार्षदों का ऋभुओं द्वारा भगा देने का समाचार भगवान शंकर जी ने जब नारद जी के मुखारविंद से सुना तो उन्हें अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ जिसके कारण शिव ने अपने ओठों को दाँतों से दवा कर भयानक रूप से भारी अठ्हास करते हुये गंभीर नाद किया, और भूल से लिप्त अपनी जटाओं में से एक महातेज वाली जटा को उखाड़ कर पृथ्वी पर पटक कर देमारा।

रूद्र अवतार एवं स्वरूप।।



जिसके पटकने से तुरन्त वहाँ मेघ के समान वर्ण वाला, हजार भुजा वाले, बहुत बड़ी देह वाला स्वर्ग तक लम्बा और सूर्य के समान तीन नेत्र वाला जिसकी दाड़े महा विक्राल, और केश अग्नि के समान प्रज्वल्लित मुन्डों की माला पहिने हुये अनेक प्रकार के अस्त्रों को हाथों में लिये एक वीरभद्र नाम का रुद्र का गण प्रकट हो गया । वह वीरभद्र शिव गण तुरन्त शिव जी के सामने हाथ जोड़ कर बोला-हे प्रभु मैं आपका किंकर हूँ आज्ञा दीजिये कि मैं क्या कार्य करें। शिव जी बोले-हे रूद्र रूप धारी वीर भद्र नामक वट! तू मेरे समस्त पार्षदों में प्रधान है क्योंकि तू मेरे अंश से प्रगट हुआ है, तुझ बिन दक्ष को अन्य कोई मार न सकेगा। अतः तू अब मेरी आज्ञा से यज्ञ सहित प्रजापति दक्ष का नाश कर दे ।

सो हे विदुर जी! शिव जी की आज्ञा प्राप्त कर वह महावली भयानक वीरभद्र नाम का भगवान शंकर जी का मुख्य पार्षद अपने साथ शिव जी के सभी पार्षदों को साथ ले हाथ में विनाश कारी त्रिशूल धारण कर सीधा दक्ष के यज्ञ को ओर चल वाया। जिस समय वीर भद्र अपने साथ रुद्र गणों को साथ लिये भारी नाद करता हुआ यज्ञ स्थल के समीप पहुँचा तो उस समय यज्ञ में उपस्थित ऋत्वज तथा दक्ष और सभी सभा सद ब्राह्मण एवं ब्रह्माणियाँ दक्ष की रानी आदि जितनी स्त्रियां वहाँ पर उप स्थित थी, वे सब उत्तर दिशा में उड़ती हुई धूल को देखकर विचार करने लगे कि यह धूल कहाँ से आ रही है और अंधकार सा क्यों बढ़ता चला जारहा है । इस समय पवन भी नहीं चल रही है, और न प्राचीन राजा दंड देने वाला बर्हि ही जीवित है, इस समय गायें भी लौट कर नहीं आ रही हैं, और न कहीं चोर ही आते दिखाई देते हैं, फिर यह धूल कहां से और क्यों उड़ती हुई चली आती है। कुछ परस्पर महात्मा लोग इस प्रकार बात करने लगे कि ज्ञात होता है, यह सब सती का अपमान कर दक्ष ने अपनी पुत्र को अग्नि में जलने दिया, उसी पाप का फल है। जो भगवान शंकर प्रलय काल में अपने जटा जूट विखेर कर त्रिशूल की नोंक से दिग्गजों को छेद डालते हैं, तथा अस्त्र शस्त्र भुजाओं में धारण कर नृत्य करते हैं, जो केवल उच्च अट्टहास से ही दशों दिग्गजों को विदीर्ण कर देते है, अपनी भयंकर दाढ़ों से तारा गणों को नाश कर देते हैं। सो एसे असहनीय तेज वाले भगवान शंकर जी को कंपायमान करके मानव तो क्या स्वयं ब्रह्मा भी सुख नहीं पा सकते है हे विदुर जी ! इधर देवता, महात्मा, तथा यज्ञ में उपस्थित सभी सभासद ऋषि मुनि जो भी उपस्थित थे वे सब इस प्रकार नाना प्रकार की बातें करते थे, कि तब तक वीर भद्र के साथ शिव गण नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र धारण कर अनेक प्रकार के शरीर एवं आकृति वालों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ स्थल को चारों ओर से आकर घेर लिया। वे नाना प्रकार जो जी में आता उसी प्रकार के उपद्रव करने लगे। किसी ने पत्नी शाला को नष्ट कर दिया तो किसी ने अग्नी शाला का नाश कर डाला, किसी ने पाक भोजन शाला का विध्वंस कर डाला, किसी ने यज्ञ की अग्नी को ही बुझा दिया, किसी ने वेदी और मेखला को ही तोड़ डाला, कुछ शिव गण स्त्रियों के समूह में जाकर उन्हें अपना भयानक भेष दिखा कर भय भीत किया, कुछ ने यज्ञ मंडल को तोमें उखाड़ कर यज्ञ शाला से बाहर फेंक दिया, कुछ ने यज्ञ मंडप को तोड़ मरोड़ कर विध्वंश कर दिया, कुछ ने यज्ञ के पात्रों को तोड़ फोड़ कर तहस नहस कर दिया, कुछ ने अग्नि कुंड तथा जल कुन्ड़ों में मल मूत्र कर दिया, शिव गण ऋषि मुनियों को मारने पीटने एवं दुख देने लगे। कुछ ने देवताओं को और मुनियों ऋषियों को पकड़-पकड़ कर बुरी दुर्दशा करना आरम्भ कर दिया । अभिमान नामक शिव गण ने भृगु ऋषि को बाँध लिया, तथा वीर भद्र ने दक्ष को, तथा चंदेश्वर ने पूषा देव को, और नंदीश्वर ने भगदेव को पकड़ लिया। अनेकों शिव गण पत्थरों की वर्षा करने लगे, जिसके कारण ऋत्विज, सभासद, देवता आदि पीड़ित हो इधर उधर भागने लगे तब यह दारुण दुख देख कर भृगु मुनि ने फिर कुशा हाथ में ले हवन कर ऋभु देवों को प्रकट करना चाहा जिस के किये आकर शिव गणों से उन सब की रक्षा कर सकें। परन्तु उसी क्षण वीर भद्र ने भृगु को पकड़ कर मार पीट शुरू करदी, और उस भृगु की दाड़ी मूछं उखाड़लीं क्योंकि जिस समय भगवान शकर को सभा में दक्ष ने खोटे बचन कहे थे उस समय भृगु ने दाड़ी हिला कर हंसते हुये मूंछों पर हाथ फेरा था। इधर भगदेवता भी अपनी रक्षा के लिये इधर उधर भागने लगा तो बीर भद्र ने उसे भी पकड़ लिया और उसकी दोनों आँखें फोड़ डाली। उसे धरती पर पटक दिया। क्योंकि शिव शाप के समय इसने भी दक्ष की ओर से सैन चलाते हुए भगवान शंकर की निंदा की थी । शिव शाप के समय पूषा देवता दाँत दिखा कर ठहा कल हँसा था, तथा शिव जी की निंदा की थी, इसी कारण वीरभद्र पूषा देवता को पकड़ मारा पीटा और पृथ्वी पर पटक कर उसके सब दांत उखाड़ डाले । तत्पश्चात वीर भद्र ने क्रोधित हो प्रजापति को पकड़ कर पृथ्वी पर देमारा और अपने अस्त्र शस्त्रों से उसके गले को काटने लगा। परन्तु उस समय वीर भद्र को अत्यंत विस्मय हुआ कि जब दक्ष का सिर किसी भी अस्त्र शस्त्र से किंचित मात्र भी न कटा, तो वह बारम्बार अपने मन में यह विचार करने लगा कि इस दक्ष का सिर इन अस्त्र शस्त्र से क्यों नहीं कट रहा है। वह बहुत काल तक विचार करता रहा, तब उसने सोचा कि इस यज्ञ में पशु को गला घोंट कर मारते हैं। अतः इसी प्रकार दक्ष को भी मारना चाहिये। ऐसा विचार कर दक्ष को वीर भद्र ने गर्दन मरोड़ कर सिर को झटका मार कर धड़ से उलग करके मार डाला, और उस दक्ष के अलग किये हुथे शिर को दक्षिण अग्नि वाले होम कुन्ड में डाल कर होम कर दिया। तत्पश्चात सारी यज्ञ शाला और वहाँ की सब सामिग्री को नष्ट कार दिया । पश्चात अपने सब शिव गणों को साथ लिये विजय नाद करता हुआ शिव जी के पास कैलाश पर्वत पर चला आया।


विषय सूची [श्रीमद भागवद पुराण]

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श्रीमद भागवद पुराण [introduction]


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• श्रीमद भागवद पुराण [मंगला चरण]


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• श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध १]


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• श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध २]

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• श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ३]

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श्रीमद्भगवद पुराण* नवा अध्याय*[सकन्ध २] दोहा: इस नौवें अध्याय में, कहें शुकदेव सुनाय । विष्णु चरित्र जिमि रूप से हरिने किये बनाय ।। ब्रह्मा विष्णु सृष्टि रचना हेतू संवाद अनेक रूप धारी ईश्वर माया द्वारा अनेक रूप वाला प्रतीत होता हैं। मनुष्य माया के भवर में फंस कर रमण करता हुआ कहता है कि यह मेरा है वह मेरा है यह मैं हूँ वह वह है तो केवल ईश्वर में ही रमण करता है तब वह मोह माया लोभ ममता को त्याग कर देता है अहंकार दूर हो जाता है तो केवल ईश्वर में ही पूर्णरूप से स्थित रहता है यही मोक्ष है। श्रीशुकदेवजी बोले-हे परीक्षत । जब आदि शक्ति निरंकार परमेश्वर को नाभि से कमल का फूल निकला तो उस में वृह्माजी उत्पन्न हुये। उस समय वृह्माजी ने यह जानना चाहा कि वह किस स्थान से उत्पन्न हुये हैं। जब वह अनेक प्रयत्न करने पर भी यह न जान सके कि वह कहां और कैसे उत्पन्न हुये हैं तो मन मारकर उसी कमल के फूल पर बैठे रहे। तब निरंकार ईश्वर द्वारा वृम्हाजी को चेतना प्राप्त हुई जिसमें तन्हें उस निरंकार भगवान का यह आदेश मिला कि वह सृष्टि की रचना करें। तब जगत के गुरु वृम्हा ने जगत सृष्टि रचने का विचार करने लगे। परन्तु वहअन...

सृष्टि के संचालक श्री सूर्य नारायण।

  विषय सूची [श्रीमद भागवद पुराण] श्रीमद भागवद पुराण [introduction] • श्रीमद भागवद पुराण [मंगला चरण] श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध १] •  श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध २] •  श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ३] श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ४] श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ५] श्रीमद भागवद पुराण स्कंध ६ कैसे सूर्य भगवान करते हैं, दिन, घड़ी, समय का निर्माण। सृष्टि के संचालक श्री सूर्य नारायण। सूर्य की परिक्रमा, पूर्ण विस्तारक, राशियों में प्रवेश, खगोल, भूगोल, दिन, रात, इत्यादि।  नवीन सुख सागर श्रीमद भागवद पुराण इक्कीसवां अध्याय [स्कंध ५] राशि संचार द्वारा लोक यात्रा निरूपण दोहा-सूर्य चन्द्र की चाल से, होवे दिन और रात। सो इक्कीस अध्याय विच, लिखी लोक की बात ।। श्री शुकदेवजी बोले-हे राजा परीक्षत! जितना प्रमाण वाहक से पृथ्वी मण्डल का कहा है, उतना ही नभ मण्डल का है।  भूगोल और खगोल के बीच का भाग आकाश है।  जो कि दोनों से मिला हुआ है। इसी के अन्तरिक्ष के बीच में सूर्य नारायण उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुवत नाम वाली मन्द, शीघ्र, समान गति से ऊँचे-नीचे चढ़कर त्रिलोकी को तपते हुए समान स्थान पर च...