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श्रीमद भागवद पुराण तेईसवां अध्याय [स्कंध४] (पृथु का विष्णु लोक गमन)

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श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ४]

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अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।  
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥13॥


वह ‘है’ - इस प्रकार ही उपलब्ध करने योग्य है, और तत्वभाव से भी । दोनों में से जिसे ‘है’ - इस प्रकार की उपलब्धि हो गयी है, तात्विक स्वरुप उसके अभिमुख हो जाता है ।


The Self should be apprehended as existing and also as It really is. Of these two (aspects), to him who knows It to exist, Its true nature is revealed.

#कठोपनिषद् [ 2-III-13 ]

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।   अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥13॥  वह ‘है’ - इस प्रकार ही उपलब्ध करने योग्य है, और तत्वभाव से भी । दोनों में से जिसे ‘है’ - इस प्रकार की उपलब्धि हो गयी है, तात्विक स्वरुप उसके अभिमुख हो जाता है ।  The Self should be apprehended as existing and also as It really is. Of these two (aspects), to him who knows It to exist, Its true nature is revealed.  #कठोपनिषद् [ 2-III-13 ]     श्रीमद भागवद पुराण तेईसवां अध्याय [स्कंध४] (पृथु का विष्णु लोक गमन) दो-ज्यों पतिनी युत नृप पृथु, लो समाधि बन जाय। सो सब ये वर्णन कियो, तेईसवें अध्याय ।।  मैत्रेय जी बोले-हे विदुर! राजा पृथु ने जिस प्रयोजन के लिये जन्म धारण किया था। सो ईश्वर आज्ञा से प्रजा पालनादि सब कर्म पूर्ण रूप से पूर्ण किये। तब अपनी वृद्धावस्था जान कर राजा पृथु ने अपने पुत्रों को राज्य सौंप कर भगवान भजन के निमित्त अपनी स्त्री सहित बन को गवन किया । तब बन में वैखा नख आश्रम में निवास कर वानप्रस्थ मार्ग में मन लगा कर एक चित्त हो उग्र तप किया । पहिले फल फूल कंद मूल का आहार करना आरंभ किया, फिर सूखे पत्तों का आहार करने लगे, पश्चात केवल जल का आहार करते, फिर केवल पवन भक्षण करने लगे। वे वीर राजा पृथु ग्रीष्म काल में पंचाग्नि में तपते, वर्षा काल में बर्षा के जल को अपने ऊपर सहते तथा शीत काल में गर्दन तक जल में खड़े होकर तप करते, और भूमि पर सयन करते थे। इस प्रकार पवन को जीत कर महाराजा पृथु भगवान श्री नारायण का तप करने लगे । इस प्रकार बढ़ते हुये तप की छाया में कर्म बासनायें विलीन हो गई । राजा का अतः करण तप के प्रभाव से शुद्ध हो गया, प्राणायाम करने से इंन्द्रियाँ वश में हो गई, जो पंच महाभूत के बंधन थे वे सब कट गये । सनत्कुमारों द्वारा कहे अनुसार ही राजा पृथु ने उग्र तप करते हुये भजन किया । इस प्रकार तप करते हुये राजा पृथु शुद्ध वत्स होने के कारण मन को आत्मा से लगा कर दृढ़ वृक्ष स्वरूप होकर अपने शरीर को छोड़ दिया। जिससे वह जीवत्वाभिमान करने वाली उपाधि रूप माया को परित्याग कर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात राजा पृथ की महारानी अर्चि बन को चली गई । जहाँ से ईंधन चुन कर चिता बनाय अपने पति के मृतक शरीर को उस पर रख कर फिर स्नान आदि कर्म करके पूजन विधान से अपने पति के साथ ही शरीर सहित चिताग्नि में भस्म हो गई श्री मेत्रैय जी बोले-हे विदूर पुरूषात्मा कीर्तिमान राजा पृथु का चरित्र सुनने से अथवा सुनाने से धन, यश, आयु, की वृद्धि होती है, तथा स्वर्ग का वास मिलता है। इस चरित्र को जो मनुष्य सुने या सुनावे तो वह संसार रूप सागर से पार होकर भगवान के पद को प्राप्त होता है ।  Find the truthfulness in you, get the real you, power up yourself with divine blessings, dump all your sins...via... Shrimad Bhagwad Mahapuran🕉


श्रीमद भागवद पुराण तेईसवां अध्याय [स्कंध४]

(पृथु का विष्णु लोक गमन)

दो-ज्यों पतिनी युत नृप पृथु, लो समाधि बन जाय।

सो सब ये वर्णन कियो, तेईसवें अध्याय ।।


मैत्रेय जी बोले-हे विदुर! राजा पृथु ने जिस प्रयोजन के लिये जन्म धारण किया था। सो ईश्वर आज्ञा से प्रजा पालनादि सब कर्म पूर्ण रूप से पूर्ण किये। तब अपनी वृद्धावस्था जान कर राजा पृथु ने अपने पुत्रों को राज्य सौंप कर भगवान भजन के निमित्त अपनी स्त्री सहित बन को गवन किया । तब बन में वैखा नख आश्रम में निवास कर वानप्रस्थ मार्ग में मन लगा कर एक चित्त हो उग्र तप किया । पहिले फल फूल कंद मूल का आहार करना आरंभ किया, फिर सूखे पत्तों का आहार करने लगे, पश्चात केवल जल का आहार करते, फिर केवल पवन भक्षण करने लगे। वे वीर राजा पृथु ग्रीष्म काल में पंचाग्नि में तपते, वर्षा काल में बर्षा के जल को अपने ऊपर सहते तथा शीत काल में गर्दन तक जल में खड़े होकर तप करते, और भूमि पर सयन करते थे। इस प्रकार पवन को जीत कर महाराजा पृथु भगवान श्री नारायण का तप करने लगे । इस प्रकार बढ़ते हुये तप की छाया में कर्म बासनायें विलीन हो गई । राजा का अतः करण तप के प्रभाव से शुद्ध हो गया, प्राणायाम करने से इंन्द्रियाँ वश में हो गई, जो पंच महाभूत के बंधन थे वे सब कट गये । सनत्कुमारों द्वारा कहे अनुसार ही राजा पृथु ने उग्र तप करते हुये भजन किया । इस प्रकार तप करते हुये राजा पृथु शुद्ध वत्स होने के कारण मन को आत्मा से लगा कर दृढ़ वृक्ष स्वरूप होकर अपने शरीर को छोड़ दिया। जिससे वह जीवत्वाभिमान करने वाली उपाधि रूप माया को परित्याग कर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात राजा पृथ की महारानी अर्चि बन को चली गई । जहाँ से ईंधन चुन कर चिता बनाय अपने पति के मृतक शरीर को उस पर रख कर फिर स्नान आदि कर्म करके पूजन विधान से अपने पति के साथ ही शरीर सहित चिताग्नि में भस्म हो गई श्री मेत्रैय जी बोले-हे विदूर पुरूषात्मा कीर्तिमान राजा पृथु का चरित्र सुनने से अथवा सुनाने से धन, यश, आयु, की वृद्धि होती है, तथा स्वर्ग का वास मिलता है। इस चरित्र को जो मनुष्य सुने या सुनावे तो वह संसार रूप सागर से पार होकर भगवान के पद को प्राप्त होता है ।

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