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श्रीमद भागवद पुराण * तीसरा अध्याय *[स्कंध ५] ऋषभ देव अवतार।।

धर्म कथाएं

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श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ५]


तब हे राजा परीक्षत! राजा नाभि की इस प्रार्थना से संतुष्ठ हो भगवान श्री हरि नारायण जी ने कहा-हे राजन ! तुमने यह बड़ा कठिन वरदान माँगा कि तुम्हारे मेरे ही समान पुत्र उत्पन्न हो । सो वह मेरे समान तो केवल में ही हूँ, सो तुम्हारी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए स्वयं में ही अंशावतार ले पत्र रूप में प्रकट होउंगा। सो हे राजा परीक्षत ! इस प्रकार वरदान दे भगवान श्री हरि नारायण तो अंतर्ध्यान हो गये और कालान्तर में राजा रानी में शुक्ल शरीर धारण कर स्वयं नारायण जी ऋषि मुनि तथा तपस्वियों को उपदेश करने के लिए ऋषभ देव नाम से अवतार धारण कर प्रकट हुए ।

श्रीमद भागवद पुराण * तीसरा अध्याय *[स्कंध ५] ऋषभ देव अवतार

( नाभि का चरित्र वर्णन )


दोहा-ऋषभ यज्ञ प्रकटित भये, यज्ञरूप अवतार।

सो तीसरे अध्याय में, कही कथा सुख सार ।।


 



श्री शुकदेव जी बोले-हे राजा परीक्षत! राजा अग्नि का बड़ा पुत्र नाभि अपने पिता द्वारा दिये पृथ्वी खंड पर सुख पूर्वक राज्य करता था। परन्तु उसके कोई संतान नहीं थी, इसी कारण वह संतान प्राप्ती का उपाय करने लगा। नाभि अपनी भार्या मेरु देवी सहित यज्ञानुष्ठान द्वारा यज्ञ पुरुष भगवान की आराधना करने लगा। इस प्रकार राजा नाभि ने जब शुद्ध भाव से भक्ति सहित यज्ञ किया तो वसुदेव भगवान ने प्रसन्न हो यज्ञ में प्रत्यक्ष प्रकट होकर राजा को अपना तेजोमय दर्शन दिया।


तब सुन्दर श्रृंगार धारण किये सुन्दर स्वरूप भगवान को देख कर राजा नाभि ने भगवान को प्रणाम कर मस्तक नवाया और ऋत्विजों के सहित भगवान वासुदेव की सप्रेम पूजा अर्चना की । फिर इस प्रकार स्तुति करने लगे -हे त्रिलोकी नाथ! पूज्यतम! आप परि पूर्ण हो, आपने मुझ दीन की अभिलाषा पूर्ण करने के लिये दयाल होकर दर्शन दिया है, आप सर्व प्रकार से समर्थ हो हम तो क्या देवता गण भी आपकी माया का पार नहीं पाते हैं, वे भी आपकी पूजा स्तुति करने में असमर्थ हैं, फिर भी आपको हम मृत्यु लोगों का पूजन स्वयमेव अंगीकार करना चाहिये । क्योंकि आपके स्वरूप का जानना तो महात्मा पुरुष को भी अति कठिन है इस लिये हमने तो केवल महा पुरुषों से नमस्कार करना ही सीखा है। हे प्रभु ! हमने सुना है कि आप अपने भक्तजनों की प्रीति पूर्वक गद-गद बचन द्वारा स्तुति करने पर हो परम प्रसन्न हो जाते है । हे नाथ ! आप सब पुरुषार्थों के आनंद स्वरूप हो, जो स्वतंत्र साक्षात स्वयम्भू प्रगट हुये हो। परन्तु हम तो आसा रखकर सकाम भक्त हैं सो हमें तो आपकी आराधना मात्र करनी ही योग्य है। हम तो अज्ञानी हैं जो अपनी आत्मा के लिये परमकल्याण दायक मार्ग को नहीं जानते हैं। आपने हे प्रभु! हमारे ऊपर परम अनुग्रह किया है, जो अपनी मोक्ष नामक महिमा तथा मनवांच्छित कामना प्रदान करने के लिये हमें बिना ही किसी कठिन तप ब्रत पूजा आदि के किये ही एक सामान्य देवता के समान साक्षात हो हमें दर्शन दिया है। हे प्रभु! आप कृपा कर हमें एक वरदान दीजिये कि हम पर चाहे कैसी भी विपत्ति आवे परन्तु हम आपके इस मंगल कारी स्वरूप को कभी विस्मरण न करें। हे दीनबन्धु ! हे शरणागत ! हे दीन दयालु ! हमारी दूसरी आकांक्षा यह है कि मुझे आपके समान एक पुत्र रत्न प्राप्त हो। हे कृपा नाथ! आप ही मेरी इस इच्छा को पूर्ण करने में समर्थ हो, सो आप अपनी कृपा करो मेरी इस अंतिम अभिलाषा को पूर्ण कीजिए ।


तब हे राजा परीक्षत! राजा नाभि की इस प्रार्थना से संतुष्ठ हो भगवान श्री हरि नारायण जी ने कहा-हे राजन ! तुमने यह बड़ा कठिन वरदान माँगा कि तुम्हारे मेरे ही समान पुत्र उत्पन्न हो । सो वह मेरे समान तो केवल में ही हूँ, सो तुम्हारी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए स्वयं में ही अंशावतार ले पत्र रूप में प्रकट होउंगा। सो हे राजा परीक्षत ! इस प्रकार वरदान दे भगवान श्री हरि नारायण तो अंतर्ध्यान हो गये और कालान्तर में राजा रानी में शुक्ल शरीर धारण कर स्वयं नारायण जी ऋषि मुनि तथा तपस्वियों को उपदेश करने के लिए ऋषभ देव नाम से अवतार धारण कर प्रकट हुए ।




 



Preserving the most prestigious, सब वेदों का सार, प्रभू विष्णु के भिन्न अवतार...... Shrimad Bhagwad Mahapuran 🕉

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