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श्रीमद भागवद पुराण ग्यारहवां अध्याय [स्कंध ५] (जड़ भरत का निर्मल उपदेश)

श्रीमद भागवद पुराण ग्यारहवां अध्याय [स्कंध ५] (जड़ भरत का निर्मल उपदेश)  दोहा-दियो रहूगण को भरत, जिस प्रकार उपदेस।  सो ग्यारह अध्याय में, वर्णन कियौ विशेष ॥  श्री शुकदेव जी बोले-हे परीक्षत ! रहूगण के इस प्रकर पूछने पर जड़ भरत ने कहा--  हे रहूगण! यद्यपि तुम पंडित (विद्वान) नहीं हो, परन्तु तुम उन की सी बातें अवश्य बनाते हो । लो इस कारण तुम पंडित जैसे लगने पर भी अधिक पंडितों की संगति में तुम योग्य और श्रेष्ठ नहीं कहे जा सकते हो । क्योंकि पंडितजन इस व्यवहार को मिथ्या ठहराते हैं। क्योंकि जिस प्रकार संसार का व्यवहार झूठा है उसी प्रकार वेदोक्त कर्म-काण्ड व्यवहार भी झूठा है। क्योंकि वेदों में गृहस्थाश्रम संबंधी अनेक यज्ञों के विस्तार विषयक विद्याओं का वर्णन करने वाले अनेक वेद वाक्यों में विशेष करके तत्वज्ञान की बात प्रकाशित नहीं होती है।   ऐसा न होने का मूल कारण यह है कि वह तत्वज्ञान शुद्ध है।


श्रीमद भागवद पुराण ग्यारहवां अध्याय [स्कंध ५] (जड़ भरत का निर्मल उपदेश)

दोहा-दियो रहूगण को भरत, जिस प्रकार उपदेस।

सो ग्यारह अध्याय में, वर्णन कियौ विशेष ॥

श्रीमद भागवद पुराण * दसवां अध्याय *[स्कंध ५]
(जड़ भरत और रहूगण का संवाद)


श्री शुकदेव जी बोले-हे परीक्षत ! रहूगण के इस प्रकर पूछने पर जड़ भरत ने कहा--





हे रहूगण! यद्यपि तुम पंडित (विद्वान) नहीं हो, परन्तु तुम उन की सी बातें अवश्य बनाते हो । लो इस कारण तुम पंडित जैसे लगने पर भी अधिक पंडितों की संगति में तुम योग्य और श्रेष्ठ नहीं कहे जा सकते हो । क्योंकि पंडितजन इस व्यवहार को मिथ्या ठहराते हैं। क्योंकि जिस प्रकार संसार का व्यवहार झूठा है उसी प्रकार वेदोक्त कर्म-काण्ड व्यवहार भी झूठा है। क्योंकि वेदों में गृहस्थाश्रम संबंधी अनेक यज्ञों के विस्तार विषयक विद्याओं का वर्णन करने वाले अनेक वेद वाक्यों में विशेष करके तत्वज्ञान की बात प्रकाशित नहीं होती है।

ऐसा न होने का मूल कारण यह है कि वह तत्वज्ञान शुद्ध है।

हे रहूगण! जिस प्रकार स्वप्न में प्राप्त हुआ सुख अदृश्य है, और चेतन होने पर कुछ नहीं है, अर्थात अनित्य होने से त्याग करने के योग्य है। उसी प्रकार गृहस्थाश्रम का सुख भी अनित्य से त्याज्य (त्याग करने योग्य) है। क्योंकि पुरुष का यह मत रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण, से विधा हुआ है, इसी कारण से वह निरंकुश रह कर ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के द्वारा अनेक प्रकार के पाप-पुण्यमयी कर्म किया करता है।

सो हे राजन! उसी पाप पुन्य की वासना से युक्त हुआ यह जीव अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेता रहता है काल से प्राप्त हुये दुनियाँ के दुख सुख मोह आदि फलों को यह मन ही देता है ।

भरत जी की यह बात सुन कर राजा रहूगण ने पूछा- हे ब्रह्मन् ! यह मन तो जड़ है फिर यह किस प्रकार सुख दुखादि देता है?


जड़ भरत ने कहा-हे रहूगण ! यही तो मनुष्य की भूल है क्योंकि यह मन आत्मा से मिला रहता है । इसी कारण यह सब भोगना पड़ता है।

रहूगण ने पूछा-हे नाथ ! आत्मा से मन के मिले रहने का क्या कारण है, सो भी आप स्पष्ट करके कहिये?


जड़ भरत ने कहा हे राजा! जीव को माया रचित उपाधि यह मन ही है इसलिये यह असत्य बोल कर छल करने वाला है जो कि जीव को ठग की तरह ठग कर इस संसार रूप चक्र में घुमाता रहता है । अर्थात् यह मन जीव को अपनी चंचल कृत्ति से ठग कर ऐसे कर्म कराता रहता है, जो क्षणिक सुख देने वाले तथा उनके परिणाम दुखदाई तथा संसार चक्र में फसाने वाले होते हैं । इसी कारण यह जीव संसार चक्र में चक्कर खाता है अतः यह जीव इस संसार रूप चक्र से तभी छुटकारा पा सकता है जब कि वह देहधारी जीव सब संग को छोड़ कर ज्ञान के द्वारा इंन्द्रियों को जीत कर माया रूप अविद्या को दूर करके आत्म तत्व को प्राप्त नहीं कर लेता है।



इसलिये हे राजन ! तुम अपने इस अतुल पराक्रम वाले मन रूप शत्रु को जो आत्मस्वरूप ज्ञान को नष्ट करने वाला है, इसे वश में करके उसका विनाश गुरू चरणों की उपासना रूप शस्त्र से नाश करके अपनी आत्मा के स्वरूप को पहचान ।

।।🥀इति श्री पद्यपुराण कथायाम अष्टम अध्याय समाप्तम🥀।।


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