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श्रीमद भागवद पुराण पन्द्रहवां अध्याय [स्कंध५] ॥भरत वंश का वृतान्त॥

श्रीमद भागवद पुराण [स्कंध ५]


नवीन सुखसागर

नवीन सुखसागर  श्रीमद भागवद पुराण  पन्द्रहवां अध्याय [स्कंध५] ॥भरत वंश का वृतान्त॥ दोहा-भरत बन्श वर्णन कियी, श्री शुकदेव सुनाय।  भू परीक्षित सुन सभी, लीयो चित्त बिठाय ॥   श्री शुकदेवजी बोले-हे परीक्षत ! अब हम तुम्हें भरतवंश का वर्णन सुनाते हैं-- कि हे राजन ! उन राजर्षि भरत जी के पवित्र चरित्र इस प्रकार से संक्षेप में संगृह करके सदैव गान करते हैं।   जिस प्रकार गरुड़ के मार्ग का मक्खियाँ अनुसरण नहीं कर सकती उसी प्रकार अन्य कोई राजा ऋषभ देवजी के पुत्र राजा भरत के मार्ग का अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। क्योंकि उन भरतजी ने भगवान की भक्ति के हेतु, युवा अवस्था में ही स्त्री-पुत्र मित्र, राजत्व इत्यादि विषय, जो कि अत्यन्त मनोहर और त्यागने योग्य नहीं थे, उन सब पदार्थों को क्षण मात्र में विष्ठा समान परित्याग कर दिया ।  जिस भरत ने यज्ञ स्वरूप धर्म के पति, धर्म की विधि को प्रवृत्त करने वाले, अष्टांग योग स्वरूप, ज्ञान रूप फल देने वाले माया के स्वामी, नारायण हरि को नमस्कार हैं, ऐसे कह कर मृग शरीर त्यागा था, उस भरतजी के मार्ग में कौन चल सकता है। जिनके शुद्ध गुण कर्मों का वर्णन परम वैष्णवजन करते हैं।   ऐसे भरत राज ऋषि का यह चरित्र कल्याण का घर है। इस कथा के सुनने व सुनाने वाले को ईश्वर की कृपा से आयु, यश, धन, बल, परिवार की वृद्धि होती है।   सो राजा परीक्षित! भरतजी का पुत्र सुमति हुआ, जिसने श्री ऋषभदेव जी के मार्ग का अनुसरण किया। फिर सुमति का पुत्र देवजित, सुमति की भार्या वृद्धसेना से उत्पन्न हुआ।  देवजित ने अपनी आसुरी नामवाली भार्या से देवद्युम्न नाम पुत्र उत्पन्न किया।  देवद्युम्न ने धेनुमती नाम भार्या से परमश्रेष्ठी नाम का पुत्र पैदा किया। परमश्रेष्ठी ने सुवर्चला स्त्री से प्रतीह नाम पुत्र उत्पन्न किया।  इस प्रतीह ने आत्म विद्या पढ़कर स्वयं शुद्ध स्वरूप हो अंतर्यामी भगवान का साक्षात वर्शन किया था।  प्रीता को सुवर्चला नाम पत्नी से तीन पुत्र हुये जिनके प्रतीहा, प्रस्तोता उक्षगाता यह तीन नाम थे।   प्रतीहर्ता के स्तुति नाम भार्या से अज, और भूमा नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुये। भूमा के ऋषि कन्या नाम की स्त्री से उदगीथ नाम का पुत्र हुआ। उदगीथ की देवकुल्य भार्या से प्रस्ताव नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रस्तावना ने अपनी नियुत्सा नाम वाली भार्या से विभु नाम का पुत्र उत्पन्न किया। विभु की रति नाम वाली स्त्री से पृथुषेणा नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथुषेण की स्त्री आकृति से नक्त नाम का पुत्र हुआ, तथा नक्त ने अपनी भार्या द्रति में गम नाम का पुत्र उत्पन्न किया।  मय ने अपनी गयन्ती नाम वाली भार्या में तीन पुत्र चित्ररथ, सुगति, अवरोधन, नाम के प्रकट किये । चित्ररथ के उर्ण नाम की भार्या में सम्राट नाम का पुत्र उत्पन्न किया | सम्राट ने उत्कला नाम वाली भार्या में मरीच नाम का पुत्र उत्पन्न किया, मरीच ने विन्दुमती नाम स्त्री से विन्दुमान नाम का पुत्र उत्पन्न किया । फिर विन्दुमान ने सरधा नाम की भार्या से मधु नाम पुत्र प्रकट किया। मधु ने सुमना नाम स्त्री से वीरब्रत नाम का पुत्र उत्पन्न किया। वीरव्रत को भोज नामा स्त्री से नंथु, प्रमंथु, नाम के दो पुत्र हुये, मंथु की सत्य नाम की स्त्री से भौम नाम का पुत्र हुआ। भीम की भार्या दूषणा से त्वष्टा नाम का पुत्र हुआ । त्वष्टा को विरोचना स्त्री से शतजित आदि सौ पुत्र और एक कन्या हुई । पश्चात और अनेक पीड़ी के पश्चात इसो वंश में अंतिम राजा विरण हुआ, जिसने महाराज प्रियव्रत के वंश को अपनी निर्मल कीर्ति से सुशोभित कर दिया। ।।🥀इति श्री पद्यपुराण कथायाम पन्द्रहवां अध्याय समाप्तम🥀।।  ༺═──────────────═༻ ༺═──────────────═༻ _人人人人人人_अध्याय समाप्त_人人人人人人_



श्रीमद भागवद पुराण पन्द्रहवां अध्याय [स्कंध५] ॥भरत वंश का वृतान्त॥

दोहा-भरत बन्श वर्णन कियी, श्री शुकदेव सुनाय।

भू परीक्षित सुन सभी, लीयो चित्त बिठाय ॥


श्री शुकदेवजी बोले-हे परीक्षत ! अब हम तुम्हें भरतवंश का वर्णन सुनाते हैं-- कि हे राजन ! उन राजर्षि भरत जी के पवित्र चरित्र इस प्रकार से संक्षेप में संगृह करके सदैव गान करते हैं।

जिस प्रकार गरुड़ के मार्ग का मक्खियाँ अनुसरण नहीं कर सकती उसी प्रकार अन्य कोई राजा ऋषभ देवजी के पुत्र राजा भरत के मार्ग का अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। क्योंकि उन भरतजी ने भगवान की भक्ति के हेतु, युवा अवस्था में ही स्त्री-पुत्र मित्र, राजत्व इत्यादि विषय, जो कि अत्यन्त मनोहर और त्यागने योग्य नहीं थे, उन सब पदार्थों को क्षण मात्र में विष्ठा समान परित्याग कर दिया ।

जिस भरत ने यज्ञ स्वरूप धर्म के पति, धर्म की विधि को प्रवृत्त करने वाले, अष्टांग योग स्वरूप, ज्ञान रूप फल देने वाले माया के स्वामी, नारायण हरि को नमस्कार हैं, ऐसे कह कर मृग शरीर त्यागा था, उस भरतजी के मार्ग में कौन चल सकता है। जिनके शुद्ध गुण कर्मों का वर्णन परम वैष्णवजन करते हैं।

ऐसे भरत राज ऋषि का यह चरित्र कल्याण का घर है। इस कथा के सुनने व सुनाने वाले को ईश्वर की कृपा से आयु, यश, धन, बल, परिवार की वृद्धि होती है।

सो राजा परीक्षित! भरतजी का पुत्र सुमति हुआ, जिसने श्री ऋषभदेव जी के मार्ग का अनुसरण किया। फिर सुमति का पुत्र देवजित, सुमति की भार्या वृद्धसेना से उत्पन्न हुआ।
देवजित ने अपनी आसुरी नामवाली भार्या से देवद्युम्न नाम पुत्र उत्पन्न किया।
देवद्युम्न ने धेनुमती नाम भार्या से परमश्रेष्ठी नाम का पुत्र पैदा किया। परमश्रेष्ठी ने सुवर्चला स्त्री से प्रतीह नाम पुत्र उत्पन्न किया।
इस प्रतीह ने आत्म विद्या पढ़कर स्वयं शुद्ध स्वरूप हो अंतर्यामी भगवान का साक्षात वर्शन किया था।
प्रीता को सुवर्चला नाम पत्नी से तीन पुत्र हुये जिनके प्रतीहा, प्रस्तोता उक्षगाता यह तीन नाम थे।

प्रतीहर्ता के स्तुति नाम भार्या से अज, और भूमा नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुये। भूमा के ऋषि कन्या नाम की स्त्री से उदगीथ नाम का पुत्र हुआ। उदगीथ की देवकुल्य भार्या से प्रस्ताव नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रस्तावना ने अपनी नियुत्सा नाम वाली भार्या से विभु नाम का पुत्र उत्पन्न किया। विभु की रति नाम वाली स्त्री से पृथुषेणा नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथुषेण की स्त्री आकृति से नक्त नाम का पुत्र हुआ, तथा नक्त ने अपनी भार्या द्रति में गम नाम का पुत्र उत्पन्न किया।

मय ने अपनी गयन्ती नाम वाली भार्या में तीन पुत्र चित्ररथ, सुगति, अवरोधन, नाम के प्रकट किये । चित्ररथ के उर्ण नाम की भार्या में सम्राट नाम का पुत्र उत्पन्न किया | सम्राट ने उत्कला नाम वाली भार्या में मरीच नाम का पुत्र उत्पन्न किया, मरीच ने विन्दुमती नाम स्त्री से विन्दुमान नाम का पुत्र उत्पन्न किया । फिर विन्दुमान ने सरधा नाम की भार्या से मधु नाम पुत्र प्रकट किया। मधु ने सुमना नाम स्त्री से वीरब्रत नाम का पुत्र उत्पन्न किया। वीरव्रत को भोज नामा स्त्री से नंथु, प्रमंथु, नाम के दो पुत्र हुये, मंथु की सत्य नाम की स्त्री से भौम नाम का पुत्र हुआ। भीम की भार्या दूषणा से त्वष्टा नाम का पुत्र हुआ । त्वष्टा को विरोचना स्त्री से शतजित आदि सौ पुत्र और एक कन्या हुई । पश्चात और अनेक पीड़ी के पश्चात इसो वंश में अंतिम राजा विरण हुआ, जिसने महाराज प्रियव्रत के वंश को अपनी निर्मल कीर्ति से सुशोभित कर दिया।

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