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Where does the life exists beyond earth?क्या पृथ्वी के बाहर भी जीवन है?

Where does the life exists beyond earth according to vedas?क्या पृथ्वी के बाहर भी जीवन है? 

भागवद पुराण में विभीन्न लोकों की और लोक में रहने वाले विभीन्न प्राणियों का वर्णन॥

इस भाग में विभीन्न लोक (द्वीप) का पूर्ण विवरण के साथ उनकी नदियों, पर्वतमाला विस्तार का पूर्ण उल्लेख पायेंगे। इससे ये प्रमाण होता है, पृथ्वी के अलावा और भी लोकों में जीवन व्याप्त है। यद्यपि, कोई साक्षात् प्रमाण नही दिया गया। किन्तु, अगर आप वेदों और धर्म ग्रंथो को सत्य मानते हैं। तो प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं रहती।  अपनी सामर्थ्य अनुसार मैं इसे सरल भाषा में लिखने का पृयत्न करूंगी, बिना किसी चीज़ में बदलाव के।  आपके प्रेम के लिये धन्यवाद॥

पृथ्वी का हिन्दु वर्णन

श्रीमद भागवद पुराण बीसवां अध्याय[स्कंध ५]

( लोका लोक पर्वत का वर्णन )


दोहा- कर विभाग सब द्वीप कहि, कथा कही समझाय।

सो बीसवें अध्याय में दियो प्रमाण बताय॥

इस भाग में विभीन्न लोक (द्वीप) का पूर्ण विवरण के साथ उनकी नदियों, पर्वतमाला विस्तार का पूर्ण उल्लेख पायेंगे। इससे ये प्रमाण होता है, पृथ्वी के अलावा और भी लोकों में जीवन व्याप्त है। यद्यपि, कोई साक्षात् प्रमाण नही दिया गया। किन्तु, अगर आप वेदों और धर्म ग्रंथो को सत्य मानते हैं। तो प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं रहती।

अपनी सामर्थ्य अनुसार मैं इसे सरल भाषा में लिखने का पृयत्न करूंगी, बिना किसी चीज़ में बदलाव के।

आपके प्रेम के लिये धन्यवाद॥

श्री शुकदेवजी  बोले-हे परीक्षत! जंबूद्वीप का विस्तार लाख योजन का प्रमाण है। जिस प्रकार लाख योजन वाला सुमेरु गिरि इस जंबूद्वीप से घिरा हुआ है, उसी प्रकार यह जंबूद्वीप की उतने ही लाख योजन वाले क्षीर समुद्र से घिर रहा है।

■●प्लक्षय द्वीप का प्रमाण दो लाख योजन है और यह भी इतने ही प्रमाण के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष है। यह वृक्ष सुवर्ण समान कान्ति वाला ग्यारह योजन प्रमाण ऊंचा है, इसी के नाम से यह प्लक्ष्य द्वीप के नाम से प्रसिद्ध है।


इस खंड का राज्य राजा प्रियवृत ने अपने पुत्र इंध्मजिहा को दिया था। उसने इस खंड के सात खंड करके अपने सात पुत्र जिनके नाम शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत, अभय थे, उन्हें दिया, और स्वयं ने समाधि लगाय आत्म योग से अपने शरीर का परित्याग कर दिया।

इन सातों के भागों में सात पर्वत तथा सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं । अर्थात इन खण्डों में एक - एक पर्वत और एक-एक नदी हैं। उन सात पर्वतों के नाम मणिकूट, बजकर, इन्द्रसेन, ज्योतिषमान, हिरण्यष्टीव, सुवर्ण, और मेघमाला है, तथा नदियों के नाम-अरुण, नृम्ण, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा, और सत्प्रम्भरा हैं ।

इन नदियों का जल स्पर्श करने से वहाँ के लोगों का रजोगुण, तमोगुण दूर हो जाता है।

*आगे इस लोक में रहने वाले प्राणियों का वर्णन


वहां हंस, पतंग, उर्ध्वायन, सत्यांग, इन संज्ञाओं वाले चार वर्ण हैं। इनको आयु हजार वर्ष की हैं, इनकी उत्पत्ति और स्वरूप देवताओं के समान जानना । यह सब भगवान सूर्य नारायण की उपासना करते हैं। अर्थात इस खड में सूर्य नारायण को ही ब्रह्मारूप करके मानते हैं । इस प्लक्ष्यद्वीप आदि पाँचद्वोपों में पुरुषों की आयु समान भाव से वर्तमान रहती है । प्लक्ष्यद्वीप भी अपने समान प्रमाण वाले ईख रस के समुद्र से घिरा हुआ है।

●इसी प्रकार शाल्मलिद्वीप भी प्लक्ष्य द्वीप के प्रमाण से दुगुना है। अर्थात यों समझिये कि प्लक्षद्वीप दो लाख योजन विस्तार वाला है और यह शाल्मलिद्वीप चार लाख योजन विस्तार वाला है। यह द्वीप भी अपने समान परिमाण वाले मदिरा के समुद्र से घिरा हुआ है। जिस प्रकार जम्बूद्वीप में जामुन का एक लाख योजन विस्तार वाला वृक्ष है जिसके कारण वह जम्बूदीप कहा गया है, और प्लक्षदीप में पाकर का अर्थात प्लक्ष का वृक्ष ग्यारह योजन ऊंचे विस्तार वाला है सो उसे भी प्लक्षदीप कहा गया है। हम इसी प्रकार शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है, उस वृक्ष की ऊंचाई का प्रमाण चार लाख योजन का है सो इसी कारण इसे शाल्मली द्वीप कहते हैं।

इस सेमर के वृक्ष पर गरूड़ जी का घोंसला है, वेद द्वारा गरुड़जी भगवान की स्तुति किया करते हैं। इस द्वीप का राजा प्रियवृत का पुत्र यज्ञवाहु था, जिसने अपने सात पुत्रों के नाम पर इस द्वीप के सात खंड करके उन को बाँट दिये थे । उनके नाम ये हैं १- सुरोचन,२ -सौमनस्य ३-रमणक ४-देववर्ष ५-पारिभद्र ६-अप्यायन ७‐अभिज्ञात येही पुत्रों के नाम थे, इन्हीं नामों से वे खंड प्रसिद्ध हुये थे।
इन सातों खंडों में प्रत्येक में ये सात नदियाँ एक-एक में एक-एक बहती हैं-१-स्वरस, २-शतश्रृंग, ३-वामदेव, ४-कुन्द, ५-रजना, ६-नग्वा, ७-राका इसी प्रकार इन खण्डों में एक-एक पर्वत भी है।

*आगे इस लोक में रहने वाले प्राणियों का वर्णन

•श्रुति, धर, वीर्यश्व, वसुन्धर, ये चार वर्ण हैं और यहाँ चंद्र रूप भगवान का वेद मंत्रों से पूजन करते हैं।

■● इसी प्रकार मदिरा समुद्र बाहर निकल कर आठ लाख योजन का कुशद्वीप हैं। इस द्वीप में देवताओं का बनाया हुआ एक कुश स्तंभ है इसीलिये इस द्वीप को कुश द्वीप कहते हैं। इस द्वीप का विस्तार के ८ लाख योजन है। और उसी के प्रमाण (इस के ही बराबर) का इस बाहर घृत (घी) का समुद्र हैं। 
इस द्वीप का राजा प्रियव्रत का पुत्र हिरण्यरेता था। जिसके सात पुत्र जिनके नाम १-वसु, २-वसुदान, ३-दृढ़रुचि, ४-नाभिगुप्त, ५-स्तुत्यव्रत, ६-विवित्त, ७-वामदेव था।
हिरण्यरेता ने अपने इन पुत्रों के नाम पर ही इस द्वीप के सात खण्ड करके बाँट दिया था। इन सब खण्डों में भी एक-एक नदी और एक-एक पर्वत थे। पर्वतों के नाम ये है १-चक्र, २- चतुश्रृंग, ३- कपिल, ४-चित्रकूट, ५-देवानीक, ६-ऊर्ध्व रोमा ७- द्विण, तथा नदियों के नाम १-रसकुल्या, २-मधुकुल्या, ३-मित्रविंदा, ४-श्रतिविंदा, ५-देवगर्भा,
६-धृतच्युता, ७-मंत्रमाला, ये नदियाँ थीं।
*आगे इस लोक में रहने वाले प्राणियों का वर्णन
•यहाँ के रहने वाले १-कुशल, २-कोबिद, ३-अभियुक्त, ४-कुलेक, इन चार वर्णों में थे यह अग्नि रूप भगवान का पूजन करते थे ।

■●कुश द्वीप के बाहरी भाग क्रोंच द्वीप है, यह कुश दीप के प्रमाण से दूना है अर्थात इसका प्रभाव सोलह लाख योजन है यह द्वीप क्षीर(दूध) समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में एक क्रौंच नाम का पर्वत हैं, उसी कारण यह द्वीप क्रौंच द्वीप के नाम से प्रसिद्धि हुआ।
इस खंड का राजा प्रियवत का पुत्र धृतपृष्ठ था। जिसने अपने सात पुत्रों के नाम पर इस द्वीप के सात खंड करके बाँटा था। उन खण्डों के नाम भी उन्हीं के नाम पर रख दिये गये हैं उन के नाम १-आम, २-मधुरूह, ३-मघपृष्ठ, ४-सुधामा, ५-भ्राजिय ६-लोहिता्ंण, ७-बनस्पति थे। इन प्रत्येक खण्ड़ों में भी एक-एक नदी तथा एक-एक पर्वत है।
पर्वतों के नाम १ शुक्ल,२-वर्धमान, ३-भोजन, ४-उपबर्हण, ५-नन्द, ६-नन्दन, ७-सर्वतो भद्र हैं।
नदियों के नाम १-अभया, २-अमृतौधा, ३- आर्यका, ४-तीर्थवती,
५-वृत्तिरूपवती, ६-पवित्रवती, ७-शुक्ला ये सात नदियाँ हैं।
*आगे इस लोक में रहने वाले प्राणियों का वर्णन
•पुरुष, ऋषभ, द्रविण, देवक नाम वाले चार वर्ण हैं। यहाँ वरुण भगवान का पूजन करते हैं ।

■● ऐसे ही इस द्वीप से आगे शाकद्वीप है,इसका प्रमाण बत्तीस लाख योजन है। इसका अधिपति प्रियव्रत्त का पुत्र मेधातिथि था। इसके भी सात पुत्र थे। सो इसने भी इस खंड के सात भाग करके अपने पुत्रों के नाम पर रख दिए। १- परोजब, २-मनोजव, ३-पवमान, ४-धूम्रनीक, ५-चित्ररेक, ६-बहुरूप ७-विश्वाधार हैं। इनमें भी एक एक पर्वत और एक एक नदियाँ है। पर्वतों के नाम- १ -ईशान, २-उरूश्रृंग ३-बलभद्र, ४-शतकेशर, ५ सहस्रसोत ६ देवपाल ७ निजधृत हैं।
नदियों के नाम १-अनधा, २-अयुर्दा, ३-उभय स्पृष्टि, ४-अपराजिता,
५-पंचपदी, ६-सहस्रश्रुति, ७-निजधृत ये सात नदियाँ हैं ।
*आगे इस लोक में रहने वाले प्राणियों का वर्णन
•इस खंड में रहने वाले पुरुष, ऋतुब्रत,सत्यब्रत, दानव्रत, अनुब्रत वर्णधारी हैं । जो वायुरूपी भगवान की उपासना किया करते हैं। इस द्वीप को चारो ओर से दग्धिजल सागर घेरे हुये हैं।

■●इस सागर से परे पुष्कर द्वीप है जो चौसठ लाख योजन प्रमाण वाला है । यह द्वीप चारोंओर से शुद्धजल के समुद्र से घिरा हुआ है। इस खण्ड के निवासी वृह्मरूप भगवान का सकाम कर्म से पूजन करते हैं।
इस द्वीप में केवल एक ही पर्वत हैं जो मानसोत्तर नाम से प्रसिद्ध है। इसका विस्तार व ऊंचाई दश हजार योजन प्रमाण है। इसी पर्वत पर लोकपालों की चार पुरी हैं।
इन्हीं के ऊपरी भाग में सूर्य के रथ का उत्तरायण और दक्षिणायन दो अयनों पर नियतकाल भ्रमण करता है। इस द्वीप का अधिपति प्रियवत का पुत्र बीतहोत्र हुआ जिसके दो ही पुत्र हुये जिनके नाम रमणीक और धातिक थे । अत: बीतहोत्र ने दो भाग करके इन दोनों को दे दिया।

इस मीठे जल के समुद्र से परे परलोक नाम पर्वत है, जहाँ सूर्य का प्रकाश रहता है। जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं रहता है। उसको अलोक कहते हैं।

डेढ़ करोड़ सात लाख योजन प्रमाण दूसरी भूमि मीठे समुद्र के परे हैं, जिसमें प्राणी भी बसते हैं। उससे पीछे सुवर्णमयी भूमि है,वह आठ करोड़ उन्तीस लाख योजन प्रमाण वाली है, जिसमें कोई भी प्राणी निवास नहीं करता है । इसके अनन्तर लोकालोक पर्वत है। इस पर्वत की चौड़ाई एवं' लम्बाई तथा ऊँचाई इतनी है कि सूर्य से लेकर ध्रुवलोक पर्यन्त सब तेज बाले पदार्थों की किरण जो कि त्रिलोकी में चारों ओर प्रकाश करती है, वे कदाचित पीछे की ओर न पहुँच सके। यह लोकालोक पर्वत ५० करोड़ (पचास करोड़) योजन है। जो कि भूमण्डल का चौथा भाग है तथा सुमेरु पर्वत से इसकी दूरी चारों ओर साढ़े बारह योजन है। वृह्मा जी ने इस पर्वत के ऊपर चारों दिशाओं में १.ऋषभ २.पुष्करचूड़, ३.वामन, ४.अपराजित नाम के चार हाथी खड़े किये हैं। जिनकी रक्षा उत्तम पार्षदों सहित स्वयं भगवान विराजमान रहकर करते हैं।

जितना लोक के भीतर का विस्तार वर्णन किया गया है, उतना ही आलोक के बाहर का वर्णन है। हे परीक्षत ! पहिले ब्रह्माड अचेतन था। तब सूर्य ने इसमें वैराज रूप से प्रवेश किया, तब सुवर्णं के समान प्रकाश वाला ब्रह्माड इसमें से उत्पन्न हुआ, इसलिय यह हिरण्यगर्भ नाम से प्रसिद्ध है। अन्य सभी लोक भी सूर्य से ही विभक्त है । सब प्राणियों के अधिष्ठाता सूर्य ही हैं। इस कारण सूर्य नारायण की उपासना करना योग्य है।


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